भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े बिना राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य अधूरा : अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य प्रमुख प्रो. सदानंद सप्रे शासकीय कन्या महाविद्यालय में प्रज्ञा प्रवाह के अंतर्गत राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर व्‍याख्‍यान आयोजित

कटनी। शासकीय कन्या महाविद्यालय, कटनी में प्रज्ञा प्रवाह के अंतर्गत “राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर एक गरिमामय एवं ज्ञानवर्धक व्‍याख्‍यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. चित्रा प्रभात, प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. सदानंद सप्रे, विशिष्ट अतिथि श्री राकेश जी तथा डॉ. सुनील वाजपेयी, प्राचार्य, शासकीय तिलक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कटनी द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में प्राचार्य डॉ. चित्रा प्रभात ने प्रो. सदानंद सप्रे एवं राकेश का तिलक लगाकर, शॉल, श्रीफल एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। साथ ही डॉ. सुनील वाजपेयी ने सम्‍माननीय अतिथियों का संक्षिप्‍त परिचय देकर कार्यक्रम की रूपरेखा बतायी, इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकगण की गरिमामयी उपस्थिति रही।
मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य प्रमुख प्रो. सदानंद सप्रे ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति तभी सार्थक होगी जब भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि गणित, रसायन विज्ञान, भौतिकी, विधि, आयुर्वेद, दर्शन, आध्यात्म सहित अनेक विषयों में भारत का विश्व को दिया गया योगदान अत्यंत समृद्ध रहा है। शिक्षकों का दायित्व है कि वे अपने विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा के आयामों का अध्ययन करें तथा विद्यार्थियों को भारत की गौरवशाली बौद्धिक विरासत से परिचित कराएँ।
उन्होंने कहा कि हमें अपने इतिहास को केवल पराधीनता के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखना चाहिए। जब विद्यार्थियों में राष्ट्रगौरव, आत्मविश्वास और भारतीयता का भाव विकसित होगा, तब वे देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएँगे। उन्होंने यह भी कहा कि केवल अच्छे विचारों से जुड़ना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारकर समाज निर्माण में सहभागिता निभाना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है।
विशिष्ट वक्ता श्री राकेश जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “वन्दे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इसके शब्दों के साथ-साथ उसके भावार्थ को समझना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने शिक्षकों एवं विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य और महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करने का आह्वान किया, जिससे उनमें राष्ट्र के प्रति गर्व, कर्तव्यबोध एवं सांस्कृतिक चेतना का विकास हो सके।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्राचार्य डॉ. चित्रा प्रभात ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश समय की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि व्‍याख्‍यान में व्यक्त किये गये विचार शिक्षकों को नवीन दृष्टि प्रदान करेंगे तथा विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और राष्ट्र निर्माण के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने में सहायक सिद्ध होंगे।

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