भाद्रपद अमावस्या कब है? जानें तारीख, स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और पितरों के तर्पण का सही समय

भाद्रपद मास की अमावस्या का सनातन धर्म में अत्यंत महत्व है। इस दिन वर्ष भर के धार्मिक कार्यों के लिए कुश एकत्र की जाती है, इसी कारण इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या या कुशाग्रहणी अमावस्या भी कहा जाता है। डोगरी भाषा में कुश को दर्भ अथवा दाभ कहा जाता है।

पंडित श्री मनोज कृष्ण शास्त्री ने बताया कि वर्ष 2025 में भाद्रपद अमावस्या तिथि शुक्रवार, 22 अगस्त को प्रातः 11:57 बजे से प्रारंभ होकर शनिवार, 23 अगस्त को प्रातः 11:37 बजे तक रहेगी।

22 अगस्त शुक्रवार को दोपहर 11:57 बजे के बाद तीर्थस्नान, तर्पण, पिंडदान, कुशोत्पाटन जैसे कर्म करना श्रेष्ठ रहेगा।
23 अगस्त शनिवार को प्रातः 11:37 बजे तक स्नान-दान करना शुभ रहेगा। यदि किसी कारणवश कुशोत्पाटन शुक्रवार को न हो पाए, तो यह कार्य शनिवार को 11:37 पूर्वाह्न तक कर लेना चाहिए। भाद्रपद अमावस्या का व्रत 23 अगस्त शनिवार को होगा।शनिवार को भी अमावस्या होने के कारण इसको शनिश्चरी अमावस्या कहा जाएगा।

कुश का धार्मिक महत्व

पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:। कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥
— अर्थात पूजा के समय हाथ में कुश अवश्य होनी चाहिए, अन्यथा पूजा निष्फल मानी जाती है।

धार्मिक ग्रंथों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन है। इनमें वही कुश श्रेष्ठ मानी जाती है, जिसका मूल तीक्ष्ण हो, सात पत्तियाँ हों, अग्रभाग कटा न हो और वह हरी हो। कुशोत्पाटन करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें:

विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥

इसके पश्चात “हूं फट्” कहकर दाहिने हाथ से आवश्यकतानुसार कुश उखाड़ें।

कुश का प्रयोग और अन्य धार्मिक कर्म

पूजा के समय विद्वान पंडित द्वारा अनामिका उंगली में कुश की बनी पवित्री पहनाई जाती है।

शनि, राहु, केतु से पीड़ित जातकों को अमावस्या पर पितरों को तर्पण व भोग अर्पित करना चाहिए।

कुशाग्रहणी अमावस्या पर तीर्थ स्नान, जप, तप, व्रत आदि से पापों से मुक्ति और पितृदोष निवारण संभव होता है।

गंगास्नान संभव न हो तो जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र आदि का दान करें।

पंचक में मृत्यु और कुश के उपाय

धार्मिक मान्यता है कि पंचक में मृत्यु होने पर पांच लोगों की मृत्यु का भय रहता है। इससे निवारण हेतु पांच कुश के पुतले बनाकर मृतक के साथ अग्नि में समर्पित करें।

कुश से संबंधित अन्य उपयोगिता

ध्यान-पूजन
कुश के आसन पर बैठकर साधना करने से चित्त स्थिर होता है, और आध्यात्मिक बल में वृद्धि होती है।

धन वृद्धि
लाल कपड़े में कुश लपेटकर घर में रखने से धन-समृद्धि बनी रहती है।

ग्रहण काल: सूतक व ग्रहण के समय अन्न व जल में कुश डालने से दुष्प्रभाव समाप्त होता है।

आयु व स्वास्थ्य

ग्रंथों में कुश को शीघ्र फल देने वाली, रोग नाशक एवं वातावरण शुद्ध करने वाली औषधीय घास माना गया है।

ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री मो,9993874848

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